Thursday, March 25, 2021

दुनिया खुली आँखों का ख़्वाब ही रही

 जिन पलों में मुझे सबसे ज़्यादा खुश होना था

सबसे ज़्यादा दुःखी हुई हूँ

जिन पलों में मुझे कहकहे लगाने थे

रोते रोते हिचकियाँ बंध गईं


जब मुझे हवा के परों पर सवार हो

उड़ना था ख़ुशी से

आसुंओ को रोकने की नाकाम कोशिश में

धरती में गड़ जाना चाही


इंतज़ार के लंबे फेहरिस्त में

कुछ दिन ऐसे भी होते 

जिस दिन तुम्हारा हाथ थामे 

एक-एक पल को जीना था

ठीक उसी रोज छोड़ गए अकेले 


मेरी दुनिया खुली आँखों का ख़्वाब ही रही!


-सुमन शर्मा


25/3/2021

Friday, March 19, 2021

तुम सभी मौसमों का समन्वित रूप हो

तुम सभी मौसमों का समन्वित रूप हो....
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जब भी तुम्हें देखती हूँ तो मन में
 ये ख़याल आता है कि वो कौन सा मौसम रहा होगा जब तुम जन्म लिए होंगे।
 वैसे तिथिनुसार तो भादो मास रहा होगा जब जेठ-आषाढ़ से झुलसती धरा को सावन की फुहारों से राहत के बाद मेघों ने धरती को तृप्त करने की योजना बनाई होगी।

तुम भी तो ऐसे ही शीतल कर देते हो,चाहें कितना भी जलता -तपता हो मन...
किसी भी तरह की जलन हो...
होठों की सहज मुस्कराहट और मिस्री घुली बातें(तर्क से परे) पल में भिगो कर सारी जलन को सोख लेती हैं।

तुम्हारे ही आगमन की ख़ुशी में धरा ने धानी चुनर ओढ़ के हरियाली का श्रृंगार किया होगा...

कभी कपासी तो कभी कारे बादलों की छतरी तानी होगी....

मेघों ने तुम्हारे ही स्वागत के लिए तुरुह नाद बजाया होगा और तभी से मेघ गर्जना की परंपरा की शुरुआत हुई होगी...

बिजुरी ने राह में पलके बिछाई होगी और आसमान ने बूंदों की मोती बरसाई होगी तभी से बारिश के मौसम का आगाज़ हुआ होगा....

तुम में सिर्फ सावन-भादो की शीतलता और नमी ही नहीं,तुम सारे मौसमों का समन्वित रूप हो..

कभी वसंत की मादकता तो कभी बैसाख की उरठता..
कभी फागुनी बयार जैसे तो कभी जेठ की झुलसा देने वाली गर्म हवा...

 जिस महफ़िल में जाते हो,बहारों का मौसम होता है।
वीराने में भी हुजूम इकट्ठा कर देना जैसे अदा है तुम्हारी..

सबको अपने आकर्षण में ऐसे बाँध लेते हो जैसे सम्मोहन का वरदान मिला हो तुम्हें किसी देव से....

तुम समुद्र जैसे हो अगम,अथाह..तुम्हारा ओर-छोर ही नज़र नहीं आता..
बिल्कुल ही शांत...
सब कुछ हँसते-हँसते अपने अंदर छुपा लेते हो।
सबकी पीड़ा का कुछ न कुछ निदान होता ही है तुम्हारे पास,अपने हों या पराये...
जैसे समुद्र सारी नदियों को,उसकी स्वच्छता हो या दूषित होना...
 बिना ये भेद किये खुद में समाहित कर लेता है...
ठीक वैसे ही तुम नहीं जानते भेद करना....
तत्पर रहते हो सबके लिए समान रूप से ही.....
 
तुम सच में अगम्य हो क्योंकि निरतंर प्रत्यनशील होकर भी मैं अभी तक तुम्हारे निकट नहीं पहुँच पाई हूँ....
 
तुम मेरे मन के कण-कण से परिचित हो लेकिन खुद की कभी कोई खबर ही नहीं लगने देते...
फिर भी तुम्हारा सामीप्य मुझे ऊर्जा देता है,हर परिस्थिति में अनुकूलन के लिए....

प्रिय!तुम मेरे लिए कृष्ण की भांति हो..
तुम्हारा जन्म इस सदी का सबसे शुभ और सुन्दर सुयोग है मेरे लिए...

#बन्दपलकोंकीदुनिया

मत मिलना मुझे

"मत मिलना तुम कभी मुझे...।"

मत मिलना तुम कभी मुझे
कि डरती हूँ मैं तुम्हें खोने से
क्योंकि सदा से सुनी है यही
कि दूर की चीज़ें होती हैं सुहावनी

नहीं चाहती मैं
मेरे करीब आकर
खो दो तुम आकर्षण अपना
जैसे तराशा है 
खयालों में
तुम रहो सदा वैसे ही

वैसे ही जैसे धरती से दिखते हैं
सूरज,चाँद,सितारे
और आकाशगंगा में बहते नूर के धारे
तुम रहो हवा में घुली खुशबू की तरह
तुम्हें साँसों में भरकर
महकती रहूँ मैं साँस-साँस

तुम रहो यूँ ही मेरा हौसला मेरा जूनून बन के
ताकि मैं लड़ सकूँ दुःखों की फ़ौज से
सामना कर सकूँ परिस्थितियों की आँधियों का

तुम मत  होना कभी साकार 
मेरी कल्पना से परे
कि छूने से मलीन हो जाये
वो अनछुआ एहसास
काठ हो जाये तुम्हारे नाम की सिहरन

नहीं चाहती मैं अपनी संवेदनाओं का कुछ ऐसा हश्र
जैसा कि अक्सर होता है
अनवरत उपलब्धता की प्रक्रिया में

मैं सदा तड़पना चाहती हूँ तुम्हारे लिए
खयालों में ही तुम्हारे
हँसना -रोना चाहती हूँ
न होकर भी तुम्हारी
सदा के लिए तुम में खोना चाहती हूँ

मत मिलना तुम कभी मुझे....

-सुमन शर्मा

वो हारी हुई औरत

ख़ुशी के प्रदर्शन में
चमकता चेहरा
हमेशा ही मुस्कराहट में फैलें होंठ
लेकिन आँखों में है समेटे 
जाने कितने ही समंदर

वो हारी हुई औरत
जो छली गई है
जन्म के साथ ही 
बेटे-बेटी के परिपेक्ष्य में
अपने ही भाई से भेदभाव में

उम्र के कुछ अहम हिस्से में
सहमी-सहमी सी गुजरी है
बचाते हुए खुद को
जाने कितनी ही गलीज़ नज़रों की गलियों से

जीवन के इंद्रधनुषी एहसासात के बहाने
फिर छली गई है 
अपने ही अन्धविश्वास से
कदम-कदम पर
किया है भुगतान औरत होने की

 बिखरे सपनो में समेटे अपना वजूद
पूर्ण समर्पित तन मन से 
तुलसी की तरह ही एक आँगन के मध्य
खुद को स्थापित करने की कोशिश में
कितने ही टुकड़ों में विभाजित हुई है

जाने कब सबकी जरूरतों में
ख़त्म हो गई उसकी हिस्सेदारी
पता ही नहीं चला
आंगन के मध्य से तुलसी चौरा कब
बाहर लॉन में विस्थापित हो गया

ढलते सूरज और बढ़ते स्याही के संग
साए भी अलग हो गए
हर भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाने के बाद 
 हाथ आया है 
हार का अनुभव

-सुमन शर्मा

Tuesday, March 16, 2021

आओ प्रिय!

कुछ दिनों से महसूस कर रही
दूर-दूर रहना तुम्हारा
चाहें कुछ न कहो
बिन बोले ही तुम्हारी ख़ामोशी को 
सुनती रही हूँ वर्षों

नहीं छुपा सकते मुझसे मनोभावों को अपने
तुम्हारे आँखों के आईने में झांकते
 एक उम्र गुज़ारी है

क्यों मुस्करा रहे हो होंठो से
तुम्हारी मुस्कराहट की भाषा
बख़ूबी पढ़ना सीखी है मैंने

नहीं ज़रूरत तुम्हें मुझसे नज़र चुराने की
इन नज़रों के शिखर पर चमकते देखी है मैंने
जीवन रश्मि

मेरे मन गंगा में डुबकी लगा
छोड़ दो मुझमें ही सारी तपन अपनी
आओ प्रिय!

-सुमन शर्मा

अब आये हो

 इतने दिनों बाद आये हो जब 

आँखों से  पल-पल बरसते

 सावन-भादो के

बादलों से धुंधला गईं स्मृतियां


तुम्हारा इंतज़ार तो ईंधन था

जीवन के दीये का

अब आये हो जब

सांसों की लौ बुझने को है


कैसे करूँ तुम्हारा स्वगात

अब आये हो जब

नहीं पहना सकती तुम्हें

बाहों का हार

हृदय नलिनी सूख चुकी है


प्रिय!कैसे गाऊँ स्वागत गान

अब आये हो जब

मृत्यु ने 

अवरुद्ध कर दिया है कंठ मेरा


-सुमन शर्मा


Monday, March 15, 2021

गुफ़्तगू

 उसने कहा,

'तुम्हारी बातों में वज़न होता है'


मैंने हंसते हुए पूछा,"कितना?


उसने बड़ी गम्भीरता से कहा,

'जिसके नीचे मेरा सारा अपराधबोध दब जाता है'


-सुमन शर्मा



Thursday, March 11, 2021

प्रेमिकाओं के हिस्से कभी वर्षगांठ नहीं आती

"प्रेमिकाओं के हिस्से कभी वर्षगांठ नहीं आती"

जानती हूं भुलक्कड़ हो
अक्सर भूल जाते हो बातें
जिम्मेदारियों के आपाधापी में

लेकिन कभी नहीं भूलें 
कुछ जरूरी बातें जैसे
बेटी के कॉलेज सेमिनार का दिन
बेटे के टेलीफोन का समय
कभी नहीं भूलते दोस्तो के जन्मदिन

हर साल नवंबर की दो तारीखें कभी नहीं भूलते
जब एक मुस्कराती तस्वीर में हाथ थामे 
शब्दों में अपना दिल रख देते थे दुनिया के सामने

एक हूक सी उठती कलेजे में 
मुस्कराने की कोशिश में भर आती आंखें
समझाती ख़ुद को 
चाहें तुम शब्दों में कुछ भी कहो
अर्थ तो मुझसे ही है न

मैंने कब चाहा प्रेम को सार्वजनिक करना
लेकिन हमेशा ये हसरत रहती
मेरे कानों में ही बोलो
दोहराओ वो सारी यादें ,वादे
वो सारी बातें जो अंतरंगता के क्षणों में
हाथ थामे कहा था तुमने

कहो कि कितने साल,महीने,दिन, पल
तुम मिली,जीवन मे नव संचार हुआ

आज ही के दिन तो पहली बार मिले थे हम
कितने साल हो गए
गुज़रते दिनों के साथ स्मृतियां धुंधली नहीं हुई

वो एक घंटे का साथ
मनःपटल पर अंकित है
जैसे कलाई का गोदना
जो जाएगा जीवन के बाद ही

लेकिन तुमसे जीवन के कितने फलसफे सीखने के क्रम में
आज जानी

प्रेमिकाओं के हिस्से कभी वर्षगांठ नहीं आती।

  - सुमन शर्मा

कविता

[आज का दिन]
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आज देखी मैंने
खुली आँखों से ख़ुशबू
महक उठे हैं ख़्वाब सारे
खिल के हकीक़त में

आज छुआ इंद्रधनुष के सातों रंगों को
एक ही छुअन में
रंग गया है अंग-अंग 
अंतर्मन तक

भर लिया है आलिंगन में
सदियों की आरज़ू को
मेरी प्रार्थनाएँ साकार हो कर
बरसने लगी हैं सावन सी

भीग-भीग कर मैं
शीतल हुई जाती हूँ रोम-रोम
सिर से पाँव तक 
सभी दर्द और घाव तक

अपनी हथेलियों में भर ली हैं
आज मुस्कराहटें मैंने
ग़मों की बेरंग चिट्ठियां सारी
ढूढने लगीं हैं पते खुशियों के

आज का दिन रंग का है,नूर का है
उसके पास होने का है, किस्मत में जो दूर का है
आज का दिन ख़्वाबों के सच में बदलने का है
दुनियां की रवायतों से मुकरने का है.....

आज का दिन अजूबा है
क्योंकि दोनों ध्रुवों पर सूरज संग चमका
दोनों संग-संग पिघले
बहते गए संग-संग एक ही सैलाब में...

कि आज का दिन सदा के लिए यादों के इतिहास में दर्ज होने का दिन है...!!!

-सुमन शर्मा

Monday, March 8, 2021

बंद पलकों की दुनिया

 "बंद पलकों की दुनिया"


ये बंद पलकों की दुनिया

कोई बंधन न दीवार

सब नज़रों का जादू

बस पलकें बंद और

बसा लिया अपना जहां


जहाँ अपना सूरज,अपना चाँद

जब चाहें चाँद उगा  लो

और डुबा दो सूरज को

अपनी धरती,अपना आकाश

बिखेर दो सितारों को

या कि समेट लो हथेली में


हवाओं का रुख भी  तय करो

अपने मुताबिक़

बहारों के लिए अपनी पसंद के फूल

नरगिस या कि हरसिंगार

खुद ही नियत करना

बसन्त के आने का मौसम


दूर की चीजें पास हो जाती हैं

दिखती हैं बिल्कुल वैसी ही

जैसी देखना चाहें

जिस आकार और रंग में

बिल्कुल स्पष्ट


बन्द आंखें दूरबीन हो जाती हैं....


-सुमन शर्मा

सवेरा

खोलो  पलकें कि उजाला हो ख़्वाबों में कैद रहा है सूरज रात भर अब तो कर दो आज़ाद कि सवेरा हो मुस्कराओ कि खिल जाएं कलियां सारी  ख़ुशबू बिखर जाए हवा...