Tuesday, March 16, 2021

आओ प्रिय!

कुछ दिनों से महसूस कर रही
दूर-दूर रहना तुम्हारा
चाहें कुछ न कहो
बिन बोले ही तुम्हारी ख़ामोशी को 
सुनती रही हूँ वर्षों

नहीं छुपा सकते मुझसे मनोभावों को अपने
तुम्हारे आँखों के आईने में झांकते
 एक उम्र गुज़ारी है

क्यों मुस्करा रहे हो होंठो से
तुम्हारी मुस्कराहट की भाषा
बख़ूबी पढ़ना सीखी है मैंने

नहीं ज़रूरत तुम्हें मुझसे नज़र चुराने की
इन नज़रों के शिखर पर चमकते देखी है मैंने
जीवन रश्मि

मेरे मन गंगा में डुबकी लगा
छोड़ दो मुझमें ही सारी तपन अपनी
आओ प्रिय!

-सुमन शर्मा

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