तुम सभी मौसमों का समन्वित रूप हो....
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जब भी तुम्हें देखती हूँ तो मन में
ये ख़याल आता है कि वो कौन सा मौसम रहा होगा जब तुम जन्म लिए होंगे।
वैसे तिथिनुसार तो भादो मास रहा होगा जब जेठ-आषाढ़ से झुलसती धरा को सावन की फुहारों से राहत के बाद मेघों ने धरती को तृप्त करने की योजना बनाई होगी।
तुम भी तो ऐसे ही शीतल कर देते हो,चाहें कितना भी जलता -तपता हो मन...
किसी भी तरह की जलन हो...
होठों की सहज मुस्कराहट और मिस्री घुली बातें(तर्क से परे) पल में भिगो कर सारी जलन को सोख लेती हैं।
तुम्हारे ही आगमन की ख़ुशी में धरा ने धानी चुनर ओढ़ के हरियाली का श्रृंगार किया होगा...
कभी कपासी तो कभी कारे बादलों की छतरी तानी होगी....
मेघों ने तुम्हारे ही स्वागत के लिए तुरुह नाद बजाया होगा और तभी से मेघ गर्जना की परंपरा की शुरुआत हुई होगी...
बिजुरी ने राह में पलके बिछाई होगी और आसमान ने बूंदों की मोती बरसाई होगी तभी से बारिश के मौसम का आगाज़ हुआ होगा....
तुम में सिर्फ सावन-भादो की शीतलता और नमी ही नहीं,तुम सारे मौसमों का समन्वित रूप हो..
कभी वसंत की मादकता तो कभी बैसाख की उरठता..
कभी फागुनी बयार जैसे तो कभी जेठ की झुलसा देने वाली गर्म हवा...
जिस महफ़िल में जाते हो,बहारों का मौसम होता है।
वीराने में भी हुजूम इकट्ठा कर देना जैसे अदा है तुम्हारी..
सबको अपने आकर्षण में ऐसे बाँध लेते हो जैसे सम्मोहन का वरदान मिला हो तुम्हें किसी देव से....
तुम समुद्र जैसे हो अगम,अथाह..तुम्हारा ओर-छोर ही नज़र नहीं आता..
बिल्कुल ही शांत...
सब कुछ हँसते-हँसते अपने अंदर छुपा लेते हो।
सबकी पीड़ा का कुछ न कुछ निदान होता ही है तुम्हारे पास,अपने हों या पराये...
जैसे समुद्र सारी नदियों को,उसकी स्वच्छता हो या दूषित होना...
बिना ये भेद किये खुद में समाहित कर लेता है...
ठीक वैसे ही तुम नहीं जानते भेद करना....
तत्पर रहते हो सबके लिए समान रूप से ही.....
तुम सच में अगम्य हो क्योंकि निरतंर प्रत्यनशील होकर भी मैं अभी तक तुम्हारे निकट नहीं पहुँच पाई हूँ....
तुम मेरे मन के कण-कण से परिचित हो लेकिन खुद की कभी कोई खबर ही नहीं लगने देते...
फिर भी तुम्हारा सामीप्य मुझे ऊर्जा देता है,हर परिस्थिति में अनुकूलन के लिए....
प्रिय!तुम मेरे लिए कृष्ण की भांति हो..
तुम्हारा जन्म इस सदी का सबसे शुभ और सुन्दर सुयोग है मेरे लिए...
#बन्दपलकोंकीदुनिया
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