Monday, September 20, 2021

सवेरा



खोलो  पलकें कि उजाला हो
ख़्वाबों में कैद रहा है सूरज रात भर
अब तो कर दो आज़ाद कि सवेरा हो

मुस्कराओ कि खिल जाएं कलियां सारी
 ख़ुशबू बिखर जाए हवाओं में
मदहोश हुआ जाता है जो सारा आलम
लो अंगड़ाई कि तिलिस्म टूटे

तुम्हारी अलसाई पलकें चूमने को
बेचैन है पहली किरण
बदलो जो करवट  इधर
नींद से जाग जाए जग सारा

-सुमन शर्मा

Tuesday, July 20, 2021

तुम्हारी आँखों से

मैंने कभी तुम्हारा शहर नहीं देखा अपनी आँखों से
लेकिन तुम्हारी आँखों से देखा है
तुम्हारे शहर का हर वो गली चौराहा
जहाँ से तुम कारण-अकारण गुज़रते हो

वो मंदिर भी देखी हूँ
जहाँ घंटों बैठ तुम अपने इष्ट से
प्रार्थना में जाने क्या-क्या मांगते हो सिवा मेरे

उस जगह को भी 
जहाँ तुम रोज़ सुबह जाते हो कुत्तों को बिस्कुट खिलाने
हमारी बहस भी हो गई थी एक बार इस बात पर
कि उन बच्चों को बिस्कुट क्यों नहीं खिलाते
जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नहीं नसीब पेट भर

उस रेलवे क्रोसिंग को तुमसे ज़्यादा नजदीक से देखी हूँ
जिसके बंद होने पर अक्सर मोटरसाइकिल किनारे खड़ा कर
मुझे कॉल करते हो

1:10 की लोकल कितने स्टेशनों को पार कर
तुम्हें पहुंचाती है तुम्हारे गंतव्य तक
उनके नाम मुझे ऐसे जबानी याद हो गए हैं
जितने कि स्कूल में कितनी बार मास्टर जी की छड़ी खाने के बाद भी
नहीं याद हो पाया अट्ठारह का पहाड़ा

मैं कभी नहीं मिली तुम्हारे किसी दोस्त से
लेकिन तुम्हारे ज़िक्र से पहचानती हूँ
उन सभी को उनके नाम और वरीयता के क्रमानुसार

मैं जानती हूँ कि 
तुम्हारे घर की चौखट 
हमारे रिश्ते की लक्ष्मणरेखा है
लेकिन तुम्हारे घर के हर कोने से परिचित हूँ उसी तरह
जैसे कि गृहस्थी को वर्षों संभालते 
उस घर की स्त्री हो जाती है।

-सुमन शर्मा

Sunday, June 20, 2021

 नहीं जानती मैं प्रेम की ठीक-ठीक परिभाषा 

बस इतना जानती हूँ

उसका साथ अच्छा लगता है

उतनी देर को ये दुनिया कोई और ही दुनिया लगती है,

सब कुछ बहुत ही खूबसूरत होता है।

समय को रोक लेने को मन होता है  और समय को जैसे पंख लग जाते हैं।


उसको मुस्कराते देख दुःख पिघलने लगते हैं

उसकी हँसी सुन हर दर्द दम तोड़ देता है

उससे बात करके मन का हर बोझ हल्का हो जाता है

मेरे मन का शांतिदूत है वो


उसके लिए कुछ भी कर गुज़रने का मन होता है।

उसकी एक चाहत के लिए हर हद से गुज़रने का मन होता है।

उसके सामने जीवन की सब हकीकतें भूल 

मन बच्चा बन जाना चाहता है।

खिलखिलाना चाहता है।

ज़िद करना चाहता है

शरारत करना चाहता है।

मन भूल जाना चाहता है दुनिया की रवायतें

तोड़ना  चाहता है समाज के बनाए सारे बंधन

भूल कर उम्र की सीमा 

 उड़ना चाहता है उन्मुक्त पंक्षी की तरह।


प्रार्थनाओं में सारी दुनिया के बदले उसको मांग लेने का मन होता है।

अपने जीवन का हर पल उसके नाम कर देने का मन होता है।

सुबह आँख खुलने और रात में सोने तक ही नहीं

जीवन के आखिरी क्षण में आँखें बन्द होने तक 

सिर्फ उसको देखने का मन होता है।


अगर ये प्रेम है, तो हाँ मुझे प्रेम है उससे


-सुमन शर्मा

Wednesday, April 14, 2021

आईना और अक्स

 आईना और अक्स


तुम अपलक निहारते हो मुझे

तुम्हारी आँखों में ठाठें मारते

प्रेम की लहरों में गोते लगाते

तभी मेरी नजर पड़ती है

साहिल पर खड़ी एक परछाई पर

जो मेरा आभास मात्र नहीं 

उतना ही सत्य है जितना कि मेरा प्रेम

और मैं अचानक से दर्द के समंदर में डूबने लगती हूँ...!


एकाकी पलों में तुम मेरा हाथ थामे

स्वीकार करते हो जब

कि अब तुम्हें कुछ याद नहीं रहता मेरे सिवा

तुम विह्वलता से बार-बार मेरा नाम पुकारते  हो

कि ठीक उसी वक़्त एक नाम 

आ जाता है तुम्हारी जुबां पर

और मेरी सारी मुस्कराहटें आँसू बनकर

आँखों से बरसने लगती हैं.....


जब भी बुनती हूँ सपने

तुम भरते हो उसमें अपने चाहत का रंग

बड़ी तन्मयता से उकेरते हो 

मेरे समर्पित प्रेम को

मैं खुशी से झूम झूम जाती हूँ

तभी तुम्हारी पलकों में कौंध जाता है एक चित्र

और मैं खिलखिलाते हुए अचानक ही उदास हो जाती हूँ....


खिले मोंगरे सी तुम्हारी बातें

महकता है जिसमें ज़िक्र मेरा

क्यों इतनी अच्छी लगती हूँ तुम्हें

जाने कितनी उपमाओं से तुम करते हो श्रृंगार मेरा

इस बात से बेख़बर 

कि तुम्हारी एक उपमा की चुभन

चीर जाती है मेरा हृदय

और मेरी साँस थमने लगती है...!


मेरा दर्द में डूब जाना,आँखों का बरसना

उदास जो जाना और मेरी साँसों का थमना

मैं जानती हूँ

नहीं समझ पाते हो तुम 

इस अचानक हुए परिवर्तन को

काश!समझ पाते 

कि मेरा आईना हो तुम

जिसमें और कोई अक्स 

मुझे गँवारा नहीं....!


-सुमन शर्मा

Thursday, April 8, 2021

याद है अभी तक

"याद है अभी तक..."

इन दिनों 
 तुम इतने व्यस्त हो
कि तुम्हारे  ख्यालों में भी
मेरा ख्याल खो गया है कहीं 

 लेकिन मेरी बेज़ारी में भी 
एक भी लम्हा 
ऐसा नहीं गुज़रता
जिसमें 
तुम्हारी चाहत नहीं होती

टटोलती रहती हूँ 
अपनी उपस्थिति शिद्दत से
कि कहीं तो मिल जाए
तुम मे मेरे होने का कोई निशान

जानती हूँ
इतना भी सरल नहीं है
सहजता से पाना
तुम्हारे मन की थाह

याद है मुझे अब भी
कितने सालों के मशक्क़त के बाद
खोल पाई थी तुम्हारे मन  के किवाड़

एकनिष्ठ समर्पण के  दीप जलाए
तुम्हारे मन के दर पर वर्षों
तब जा के कहीं पहुंच पाई थी भीतर

अपने मन मुताबिक़ बना तो ली
 रहने की जगह लेकिन
हसरत ही रही बाक़ी
कि घोषित करो तुम खुद ही
 मुझे  मल्लिका अपने मन की।

-सुमन शर्मा

Thursday, March 25, 2021

दुनिया खुली आँखों का ख़्वाब ही रही

 जिन पलों में मुझे सबसे ज़्यादा खुश होना था

सबसे ज़्यादा दुःखी हुई हूँ

जिन पलों में मुझे कहकहे लगाने थे

रोते रोते हिचकियाँ बंध गईं


जब मुझे हवा के परों पर सवार हो

उड़ना था ख़ुशी से

आसुंओ को रोकने की नाकाम कोशिश में

धरती में गड़ जाना चाही


इंतज़ार के लंबे फेहरिस्त में

कुछ दिन ऐसे भी होते 

जिस दिन तुम्हारा हाथ थामे 

एक-एक पल को जीना था

ठीक उसी रोज छोड़ गए अकेले 


मेरी दुनिया खुली आँखों का ख़्वाब ही रही!


-सुमन शर्मा


25/3/2021

Friday, March 19, 2021

तुम सभी मौसमों का समन्वित रूप हो

तुम सभी मौसमों का समन्वित रूप हो....
__________________________________________

जब भी तुम्हें देखती हूँ तो मन में
 ये ख़याल आता है कि वो कौन सा मौसम रहा होगा जब तुम जन्म लिए होंगे।
 वैसे तिथिनुसार तो भादो मास रहा होगा जब जेठ-आषाढ़ से झुलसती धरा को सावन की फुहारों से राहत के बाद मेघों ने धरती को तृप्त करने की योजना बनाई होगी।

तुम भी तो ऐसे ही शीतल कर देते हो,चाहें कितना भी जलता -तपता हो मन...
किसी भी तरह की जलन हो...
होठों की सहज मुस्कराहट और मिस्री घुली बातें(तर्क से परे) पल में भिगो कर सारी जलन को सोख लेती हैं।

तुम्हारे ही आगमन की ख़ुशी में धरा ने धानी चुनर ओढ़ के हरियाली का श्रृंगार किया होगा...

कभी कपासी तो कभी कारे बादलों की छतरी तानी होगी....

मेघों ने तुम्हारे ही स्वागत के लिए तुरुह नाद बजाया होगा और तभी से मेघ गर्जना की परंपरा की शुरुआत हुई होगी...

बिजुरी ने राह में पलके बिछाई होगी और आसमान ने बूंदों की मोती बरसाई होगी तभी से बारिश के मौसम का आगाज़ हुआ होगा....

तुम में सिर्फ सावन-भादो की शीतलता और नमी ही नहीं,तुम सारे मौसमों का समन्वित रूप हो..

कभी वसंत की मादकता तो कभी बैसाख की उरठता..
कभी फागुनी बयार जैसे तो कभी जेठ की झुलसा देने वाली गर्म हवा...

 जिस महफ़िल में जाते हो,बहारों का मौसम होता है।
वीराने में भी हुजूम इकट्ठा कर देना जैसे अदा है तुम्हारी..

सबको अपने आकर्षण में ऐसे बाँध लेते हो जैसे सम्मोहन का वरदान मिला हो तुम्हें किसी देव से....

तुम समुद्र जैसे हो अगम,अथाह..तुम्हारा ओर-छोर ही नज़र नहीं आता..
बिल्कुल ही शांत...
सब कुछ हँसते-हँसते अपने अंदर छुपा लेते हो।
सबकी पीड़ा का कुछ न कुछ निदान होता ही है तुम्हारे पास,अपने हों या पराये...
जैसे समुद्र सारी नदियों को,उसकी स्वच्छता हो या दूषित होना...
 बिना ये भेद किये खुद में समाहित कर लेता है...
ठीक वैसे ही तुम नहीं जानते भेद करना....
तत्पर रहते हो सबके लिए समान रूप से ही.....
 
तुम सच में अगम्य हो क्योंकि निरतंर प्रत्यनशील होकर भी मैं अभी तक तुम्हारे निकट नहीं पहुँच पाई हूँ....
 
तुम मेरे मन के कण-कण से परिचित हो लेकिन खुद की कभी कोई खबर ही नहीं लगने देते...
फिर भी तुम्हारा सामीप्य मुझे ऊर्जा देता है,हर परिस्थिति में अनुकूलन के लिए....

प्रिय!तुम मेरे लिए कृष्ण की भांति हो..
तुम्हारा जन्म इस सदी का सबसे शुभ और सुन्दर सुयोग है मेरे लिए...

#बन्दपलकोंकीदुनिया

सवेरा

खोलो  पलकें कि उजाला हो ख़्वाबों में कैद रहा है सूरज रात भर अब तो कर दो आज़ाद कि सवेरा हो मुस्कराओ कि खिल जाएं कलियां सारी  ख़ुशबू बिखर जाए हवा...