खोलो पलकें कि उजाला हो
ख़्वाबों में कैद रहा है सूरज रात भर
अब तो कर दो आज़ाद कि सवेरा हो
मुस्कराओ कि खिल जाएं कलियां सारी
ख़ुशबू बिखर जाए हवाओं में
मदहोश हुआ जाता है जो सारा आलम
लो अंगड़ाई कि तिलिस्म टूटे
तुम्हारी अलसाई पलकें चूमने को
बेचैन है पहली किरण
बदलो जो करवट इधर
नींद से जाग जाए जग सारा
-सुमन शर्मा
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