आईना और अक्स
तुम अपलक निहारते हो मुझे
तुम्हारी आँखों में ठाठें मारते
प्रेम की लहरों में गोते लगाते
तभी मेरी नजर पड़ती है
साहिल पर खड़ी एक परछाई पर
जो मेरा आभास मात्र नहीं
उतना ही सत्य है जितना कि मेरा प्रेम
और मैं अचानक से दर्द के समंदर में डूबने लगती हूँ...!
एकाकी पलों में तुम मेरा हाथ थामे
स्वीकार करते हो जब
कि अब तुम्हें कुछ याद नहीं रहता मेरे सिवा
तुम विह्वलता से बार-बार मेरा नाम पुकारते हो
कि ठीक उसी वक़्त एक नाम
आ जाता है तुम्हारी जुबां पर
और मेरी सारी मुस्कराहटें आँसू बनकर
आँखों से बरसने लगती हैं.....
जब भी बुनती हूँ सपने
तुम भरते हो उसमें अपने चाहत का रंग
बड़ी तन्मयता से उकेरते हो
मेरे समर्पित प्रेम को
मैं खुशी से झूम झूम जाती हूँ
तभी तुम्हारी पलकों में कौंध जाता है एक चित्र
और मैं खिलखिलाते हुए अचानक ही उदास हो जाती हूँ....
खिले मोंगरे सी तुम्हारी बातें
महकता है जिसमें ज़िक्र मेरा
क्यों इतनी अच्छी लगती हूँ तुम्हें
जाने कितनी उपमाओं से तुम करते हो श्रृंगार मेरा
इस बात से बेख़बर
कि तुम्हारी एक उपमा की चुभन
चीर जाती है मेरा हृदय
और मेरी साँस थमने लगती है...!
मेरा दर्द में डूब जाना,आँखों का बरसना
उदास जो जाना और मेरी साँसों का थमना
मैं जानती हूँ
नहीं समझ पाते हो तुम
इस अचानक हुए परिवर्तन को
काश!समझ पाते
कि मेरा आईना हो तुम
जिसमें और कोई अक्स
मुझे गँवारा नहीं....!
-सुमन शर्मा