मैंने कभी तुम्हारा शहर नहीं देखा अपनी आँखों से
लेकिन तुम्हारी आँखों से देखा है
तुम्हारे शहर का हर वो गली चौराहा
जहाँ से तुम कारण-अकारण गुज़रते हो
वो मंदिर भी देखी हूँ
जहाँ घंटों बैठ तुम अपने इष्ट से
प्रार्थना में जाने क्या-क्या मांगते हो सिवा मेरे
उस जगह को भी
जहाँ तुम रोज़ सुबह जाते हो कुत्तों को बिस्कुट खिलाने
हमारी बहस भी हो गई थी एक बार इस बात पर
कि उन बच्चों को बिस्कुट क्यों नहीं खिलाते
जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नहीं नसीब पेट भर
उस रेलवे क्रोसिंग को तुमसे ज़्यादा नजदीक से देखी हूँ
जिसके बंद होने पर अक्सर मोटरसाइकिल किनारे खड़ा कर
मुझे कॉल करते हो
1:10 की लोकल कितने स्टेशनों को पार कर
तुम्हें पहुंचाती है तुम्हारे गंतव्य तक
उनके नाम मुझे ऐसे जबानी याद हो गए हैं
जितने कि स्कूल में कितनी बार मास्टर जी की छड़ी खाने के बाद भी
नहीं याद हो पाया अट्ठारह का पहाड़ा
मैं कभी नहीं मिली तुम्हारे किसी दोस्त से
लेकिन तुम्हारे ज़िक्र से पहचानती हूँ
उन सभी को उनके नाम और वरीयता के क्रमानुसार
मैं जानती हूँ कि
तुम्हारे घर की चौखट
हमारे रिश्ते की लक्ष्मणरेखा है
लेकिन तुम्हारे घर के हर कोने से परिचित हूँ उसी तरह
जैसे कि गृहस्थी को वर्षों संभालते
उस घर की स्त्री हो जाती है।
-सुमन शर्मा