"मत मिलना तुम कभी मुझे...।"
मत मिलना तुम कभी मुझे
कि डरती हूँ मैं तुम्हें खोने से
क्योंकि सदा से सुनी है यही
कि दूर की चीज़ें होती हैं सुहावनी
नहीं चाहती मैं
मेरे करीब आकर
खो दो तुम आकर्षण अपना
जैसे तराशा है
खयालों में
तुम रहो सदा वैसे ही
वैसे ही जैसे धरती से दिखते हैं
सूरज,चाँद,सितारे
और आकाशगंगा में बहते नूर के धारे
तुम रहो हवा में घुली खुशबू की तरह
तुम्हें साँसों में भरकर
महकती रहूँ मैं साँस-साँस
तुम रहो यूँ ही मेरा हौसला मेरा जूनून बन के
ताकि मैं लड़ सकूँ दुःखों की फ़ौज से
सामना कर सकूँ परिस्थितियों की आँधियों का
तुम मत होना कभी साकार
मेरी कल्पना से परे
कि छूने से मलीन हो जाये
वो अनछुआ एहसास
काठ हो जाये तुम्हारे नाम की सिहरन
नहीं चाहती मैं अपनी संवेदनाओं का कुछ ऐसा हश्र
जैसा कि अक्सर होता है
अनवरत उपलब्धता की प्रक्रिया में
मैं सदा तड़पना चाहती हूँ तुम्हारे लिए
खयालों में ही तुम्हारे
हँसना -रोना चाहती हूँ
न होकर भी तुम्हारी
सदा के लिए तुम में खोना चाहती हूँ
मत मिलना तुम कभी मुझे....
-सुमन शर्मा
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