Monday, March 8, 2021

बंद पलकों की दुनिया

 "बंद पलकों की दुनिया"


ये बंद पलकों की दुनिया

कोई बंधन न दीवार

सब नज़रों का जादू

बस पलकें बंद और

बसा लिया अपना जहां


जहाँ अपना सूरज,अपना चाँद

जब चाहें चाँद उगा  लो

और डुबा दो सूरज को

अपनी धरती,अपना आकाश

बिखेर दो सितारों को

या कि समेट लो हथेली में


हवाओं का रुख भी  तय करो

अपने मुताबिक़

बहारों के लिए अपनी पसंद के फूल

नरगिस या कि हरसिंगार

खुद ही नियत करना

बसन्त के आने का मौसम


दूर की चीजें पास हो जाती हैं

दिखती हैं बिल्कुल वैसी ही

जैसी देखना चाहें

जिस आकार और रंग में

बिल्कुल स्पष्ट


बन्द आंखें दूरबीन हो जाती हैं....


-सुमन शर्मा

4 comments:

  1. बंद आंखे दूरबीन हो जाती है :) बेहद सुंदर कविता :)

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    1. शुक्रिया मुकेश जी💐

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  2. बेहद सामयिक कविता. बधाई

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका💐💐

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